रायपुर जिले में चयनित धार्मिक स्थलों के लाभार्थीयों की कार्यिक दशा का अध्ययन

 

वर्षा साहू

SOS in Geography, Pt. Ravishankar Sukl University, Raipur, Chhattisgarh, India.

*Corresponding Author E-mail: varshasahukamlesh@gmail.com

 

ABSTRACT:

यह शोध पत्र रायपुर जिले के चयनित धार्मिक स्थलों से जुडे लाभार्थियों की कार्यिक दशा का अध्ययन प्रस्तुत करता है। धार्मिक स्थल केवल आस्था के केंद्र नहीं होते, बल्कि वे स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और आजीविका का महत्वपूर्ण स्रोत भी है। इस अध्ययन में धार्मिक स्थलों से जुडे पुजारी, प्रसाद विक्रेता, फूल विक्रेता, छोटे दुकानदार, भिक्षुक तथा अन्य सेवा प्रदाताओं की आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन हेतु रायपुर जिले के कुछ प्रमुख धार्मिक स्थलों का चयन किया गया तथा प्राथमिक एवं द्वितीयक तथ्यों का उपयोग किया गया। प्राथमिक तथ्यों के लिए साक्षात्कार एवं अनुसुची पद्धति अपनाई गई। अध्ययन से ज्ञात हुआ कि धार्मिक स्थलों से अनेक लोगों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार प्राप्त होता है, किंतु अधिकांश लाभार्थियों की आय अनिश्चित एवं असंगठित स्वरूप की है। शोध में यह भी पाया गया कि धार्मिक पर्यटन और श्रद्धालुओं की संख्या में वृद्धि से स्थानीय रोजगार के अवसर बढते हैं। इसके साथ ही लाभार्थियों को सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधा एवं स्थायी आय जैसी समस्याओं का सामना करना पडता है। अध्ययन के आधार पर सुक्षाव दिया गया है कि धार्मिक स्थलों से जुडे लाभार्थियों के लिए सरकारी सहायता, प्रशिक्षण एवं सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का विस्तार किया जाना चाहिए।

 

KEYWORDS: धार्मिक स्थल, लाभार्थी, कार्यिक दशा, रोजगार, रायपुर जिला, धार्मिक पर्यटन।

 

 


प्रस्तावना INTRODUCTION:

भारत एक धार्मिक एवं सांस्कृतिक विविधताओं वाला देश है। यहाँ विभिन्न धर्मो एवं आस्थाओं से जुडे अनेक धार्मिक स्थल स्थित है, जो केवल पूजा अर्चना के केंद्र नहीं बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक गतिविधियों के भी महत्वपूर्ण केंद्र है। किसी भी क्षेत्र की अस्मिता को उन्नत एवं समृद्ध करने में, बहुआयामी मानवी क्रियाकलापों एवं वातावरण का सम्मिश्रण महत्वपूर्ण होता है। हर क्षेत्र की प्राकृतिक एवं धार्मिक विकास में मानवीय संस्कृति एवं धार्मिक मान्यताएं विशेष महत्व रखती है। इसीलिए विविध संस्कृतियों, जीवन शैलियों अथवा मान्यताओं में विशेष महत्व रखता है। यहां के धार्मिक स्थल पर भौगोलिक पर्यावरण एवं पौराणिक मान्यताओं का विशेष प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है, चाहे नदियों के संगम पर स्थित धार्मिक स्थल हो अथवा पहाड़ों पर स्थित देवी माताओं के स्थल हों, भौगोलिक तथ्यों से प्रभावित होता है। जिसका प्रभाव धार्मिक स्थलों के उन्नयन में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। रायपुर जिले में महानदी के अपवाह तंत्र के अंतर्गत निहित है, जो तथ्यों में दक्षिण महाकौशल में सम्मिलित था, जिसके कारण धार्मिक एवं पौराणिक मान्यताओं में क्षेत्र की समृद्ध गौरवपूर्ण विरासत और परंपराएं विशेष महत्व रखती हैं।

 

क्षेत्र के धार्मिक स्थल में ईश्वर एवं प्रकृति का महत्वपूर्ण सामंजस्य धार्मिक स्थलों के विकास एवं परम्पराओं को विकसित करने में महत्वपूर्ण कारक सिद्ध हुए हैं। क्षेत्र के धार्मिक स्थलों से मानवीय भावनाएं परम्परा को समृद्ध करने में एवं विरासत को गौरवान्वित करने में महत्वपूर्ण है। छत्तीसगढ़ में अनेक धर्म एवं सम्प्रदाय के लोग आवासीत हुए हैं, जिनमें वैष्णव सम्प्रदाय के गुरू वल्लभाचार्य, संत कबीर, गुरू घासीदास एवं जैन एवं बौद्ध धर्म के अनुयायी प्रमुख हैं जिन्होंने सभी धर्मों और सम्प्रदायों के मध्य समरसता बनाते हुए, धार्मिक स्थलों को एक अनुपम एवं अनुकर्णित स्वरूप में विकसित किया।

 

रायपुर जिला, छत्तीसगढ राज्य का प्रमुख क्षेत्र होने के कारण अनेक धार्मिक स्थलों का केंद्र है। धार्मिक स्थलों के आसपास अनेक लोग अपनी आजीविका चलाते हैं। इनमें पुजारी, प्रसाद विक्रेता, फूल विक्रेता, छोटे दुकानदार, वाहन चालक तथा अन्य सेवा प्रदाता शामिल हैं। धार्मिक गतिविधियों से इन लोगों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार प्राप्त होता है। वर्तमान अध्ययन का उद्देश्य रायपुर जिले के चयनित धार्मिक स्थलों से जुडे लाभार्थियों की कार्यिक दशा, आय, रोजगार की स्थिरता एवं सामाजिक स्थिति का अध्ययन करना है।

 

अध्ययन के उद्देश्य:

1.  रायपुर जिले के चयनित धार्मिक स्थलों की पहचान करना।

2.  धार्मिक स्थलों से जुडे लाभार्थियों की आर्थिक स्थिति का अध्ययन करना।

3.  अध्ययन क्षेत्र में चयनित धार्मिक स्थलों के लाभार्थीयों की कार्यिक दशा एवं समस्याओं का विश्लेषण करना।

4.  धार्मिक स्थलों से उत्पन्न रोजगार अवसरों का अध्ययन करना।

5.  लाभार्थियों के जीवन स्तर में सुधार हेतु सुक्षाव प्रस्तुत करना।

 

शोध परिकल्पना:

·       धार्मिक स्थलों से स्थानीय लोगों को रोजगार प्राप्त होता है।

·       लाभार्थियों की आय श्रद्धालुओं की संख्या पर निर्भर करती है।

·       धार्मिक स्थलों से जुडे अधिकांश लाभार्थी असंगठित क्षेत्र में कार्यरत हैं।

 

अध्ययन क्षेत्र:

रायपुर छत्तीसगढ़ राज्य की राजधानी है। रायपुर जिले का गठन सन् 2012 में हुआ। जिले का विस्तार 2056’25” उत्तरी अक्षांश से 2137’35” उत्तरी अक्षांश तथा 8132’3” पूर्वी देशान्तर से 8211’25” पूर्वी देशान्तर के मध्य है। जिले की समुद्र तल से औसत ऊंचाई 298 मीटर है। अध्ययन क्षेत्र का क्षेत्रफल 2891.98 वर्ग किलोमीटर है। प्रशासनिक रूप से यह जिले 4 तहसीलों धरसींवा, आरंग, तिल्दा तथा अभनपुर में विभक्त है। 2011 की जनगणना के अनुसार जिले की कुल जनसंख्या 21,60,876 है। जिले में कुल ग्रामों की संख्या 491 तथा ग्राम पंचायतों की संख्या 408 है। जिले में 16.60% जनसंख्या अनुसूचित जातियों एवं 4.38% जनसंख्या अनुसूचित जनजातियों की है। जिले में 80.52% जनसंख्या साक्षर है। जिले की 40.91% जनसंख्या ग्रामीण एवं 59.08% जनसंख्या नगरों में निवास करती है।

 

रायपुर जिले के प्रमुख धार्मिक स्थलों को अध्ययन हेतु चयनित किया गया है, जैसेः

·       दुधाधारी मठ

·       महामाया मंदिर

·       बुढेश्वर मंदिर

·       कंकाली तालाब

·       हटकेश्वर मंदिर

·       शदाणी दरबार

·       कौशल्या माता मंदिर

·       चम्पारण

 

विधितंत्र (METHODOLOGY):

प्रस्तुत अध्ययन प्राथमिक एवं द्वितीयक आंकड़ों पर आधारित है, प्राथमिक आंकड़ों का संकलन मुख्यतः अनुसूची, साक्षात्कार के द्वारा प्राप्त किया गया।

 

आंकड़ों के स्रोत -

प्राथमिक आंकड़े - रायपुर एवं गरियाबंद जिले के धार्मिक स्थलों के लाभार्थी व्यक्तियों की सामाजिक-आर्थिक दशा से संबंधित जानकारी प्राथमिक आंकड़ों पर आधारित है। प्राथमिक आंकड़ों का संकलन अनुसूची साक्षात्कार के द्वारा किया गया। प्राथमिक आंकड़ों के संकलन के लिए सर्वप्रथम रायपुर एवं गरियाबंद जिले के उन विकासखण्डों का चयन किया गया जहां, धार्मिक स्थल स्थापित एवं विकसित हैं। तत्पश्चात सभी विकासखण्डों से धार्मिक स्थलों की सूची तैयार किया गया। विकासखण्डों से प्राप्त धार्मिक अनुसूची के अनुरूप उन सभी धार्मिक स्थलों को चयनित किया गया जहां लाभार्थी की संख्या अधिक है।

 

इन चयनित सभी धार्मिक स्थलों में उन सभी लाभार्थी से जानकारी प्राप्त की गई, जो इन धार्मिक स्थलों से स्थायी रूप से अथवा अस्थायी रूप से संबद्ध है। धार्मिक स्थलों में अस्थायी लाभार्थी विशेष कर मेला उत्सव में उपलब्ध रहते हैं।

अतः प्रत्येक धार्मिक स्थल में मेला पर्व के समय अस्थायी लाभार्थियों में से 50 प्रतिशत लाभार्थी का चयन दैव निदर्शन विधि द्वारा इस प्रकार चयनित धार्मिक स्थलों से स्थायी एवं अस्थायी लाभान्वित व्यक्तियों की सामाजिक-आर्थिक दशा संबंधी जानकारी साक्षात्कार अनुसूची द्वारा प्राप्त की गई।

 

द्वितीयक आंकड़े -

·       पुस्तकें

·       शोध पत्र

·       सरकारी रिपोर्ट

·       इंटरनेट स्रोत।

 

आंकड़ों का प्रक्रियान्वयन -

अनुसूची द्वारा प्राप्त आंकड़ों के प्रक्रियान्वयन एवं विश्लेषण कम्प्यूटर के माध्यम से किया गया। सर्वप्रथम लाभार्थी की सामाजिक एवं आर्थिक दशाओं का विश्लेषण सामाजिक दशाओं के मानक इकाईयों एवं आर्थिक दशाओं के मान इकाईयों के परिप्रेक्ष्य में किया गया। शोध अध्ययन को रोचक और बोधगम्य बनाने हेतु विश्लेषित आंकड़ों को मानचित्र एवं आरेखों के द्वारा प्रस्तुत किया गया है।

 

धार्मिक स्थल का सामान्य परिचय:

हिन्दु मंदिरो की प्राचीनता चाहे जो भी रही हो, बेहद शुरूआती दिनों में यह आकाश तले खुले सरल मंच के अतिरिक्त शायद ही कुछ और रहा होगा, संभवतः उस पर देवता के शास्त्रीय प्रतिनिधित्व के साथ उपासक में पूजा की होगी और और श्रद्धा सुमन अर्पित किये होंगें.....प्रारंभिक देवी और देवता यक्ष तथा यक्षिणी, भू-देवी, नाग और नागिन, प्रजनन जीव जैसे प्रकृति के देवता और शायद मौलिक रूप में कोई महान देवता रहे होंगे, जिसने आगे चलकर सर्व शक्तिमान शिव का रूप का ग्रहण किया।

 

छत्तीसगढ़ की भूमि की पवित्रता का संम्बध भगवान राम के काल से है, जब यह क्षेत्र दक्षिण कौशल के नाम से जाना जाता था जिसके संदर्भ रामायण, महाभारत और पूराणों में देखे जा सकते हैं। माना जाता है कि दक्षिण कौशल नाम राम के ननिहाल कौशल से जुड़ा होने का कारण उत्पन्न हो सकता है। रामायण में उल्लेखित आधुनिक बस्तर प्रभाग, दण्डकारण्य के कुछ हिस्सो से जुड़ी पहचान के साथ, माना जाता है कि वही स्थान है जहां राम ने वनवास के चौदह में से दस साल बिताये थे।

 

छत्तीसगढ़ का मध्य हिस्सा महानदी तथा उसकी सहायक नदियों के उपरी कछार की उपजाऊ बेसिन पर बसा हुआ है। महानदी, जोंक, गंगा की सहायक नदी रिहन्द, गोदावरी की सहायक नदी इन्द्रावती, हसदेव और शिवनाथ राज्य कि प्रमुख नदियां है।

 

रायपुर जिले के धार्मिक स्थल:-

रायपुर और उसके आसपास का क्षेत्र किसी जमाने में दक्षिण कौशल राज्य का हिस्सा था, हालांकि स्वयं रायपुर शहर के लिए माना जाता है कि 14वीं सदी में कल्चुरी के राजा रामचंद्र ने इसकी स्थापना कि उनके बेटे, ब्रम्हदेव राय ने शहर को उसका नाम दिया । पुरातत्वविदों के अनुसार, रायपुर कि सबसे पुरानी संरचना है उसका किला, जिसके लिए बताया जाता है कि 1460 में भुवनेश्वर सिंह ने उसका निर्माण किया था, हांलाकि वह इस समय मौजूद नहीं है। राजा अमर सिंह देव कि मौत के बाद कल्चुरियों के पतन के साथ, क्षेत्र पर मराठा भोंसले राजाओं में कब्जा कर लिया था। 1854 में यह इलाका ब्रिटिश आधिपत्य के तहत आया और रायपुर को छत्तीसगढ़ के प्रतिनिधि का मुख्यालय बनाया गया। रायपुर का सबसे पुराना और सबसे दिलचस्प भाग है पुरानी बस्ती। 500 वर्ष पुरानी देवी काली की पत्थर की मूर्ति प्राचीनता का सबूत है। काली मंदिर में आल इंडिया रेडियों कार्यलय के पास प्रतिस्थापित जो आधुनिक ढ़ाचा है, माना जाता है कि बस्तर के साही परिवार के राजगुरूओं द्वारा प्रतिमा लगभग 200 वर्ष पूर्व यहां लायी गई। भगवान राम को समर्पित दूधाधारी मठ और मंदिर बूढ़ा तालाब के पास स्थित है। पुरानी बस्ती के इलाके में, महामाया मंदिर, शीतला देवी, कंकाली तालाब की है। नवरात्री के दौरान भक्त जन बड़ी संख्या में यहां आते हैं।

 

जेतुसाव की स्मृति में 1877 में निर्मित जेतुसाव मठ है, जो रायपुर के सुविख्यात मंदिरों में से एक है। रायपुर के केन्द्र से 5 किलोमीटर की दूरी पर महादेव घाट नदी खारून के तट पर स्थित हैं। इसके बगल में हटकेश्वर महादेव मंदिर है, जिसे 1402 में निर्मित किया गया था। हाल के दिनों में उसके चारों ओर कई अन्य मंदिर बनाये गये है। रायपुर शहर से 45 किलोमीटर की दूरी पर चम्पारण है। चम्पारण को चांपाझर के नाम से जाना जाता है। चम्पारण एक प्रसिद्ध वैष्णव पीठ है जो सन्त वल्लाभाचार्य का जन्म स्थान है, जो वैष्णव संप्रदाय के संस्थापक थे। मंदिर परिसर का भीतरी भाग संगमरमर से मिलकर बना हुआ है जो इस स्थान को शांतिमय बनाता है। प्रदेश की राजधानी रायपुर से 25 किलोमीटर दूर चंदखुरी ग्राम में कौशल्या माता का मंदिर स्थित हैं जो सात तालाबों से घिरा हुआ है, जिसका एक एतिहासिक महत्व है। रायपुर जिले के अंतर्गत धार्मिक स्थल आरंग, चम्पारण, कौशल्या माता मंदिर चंदखुरी, शदाणी दरबार, हटकेश्वर महादेव, कंकाली तालाब, बुढ़ेश्वर मंदिर, महामाया मंदिर, दुधाधारी मठ आदि आते है।

 

चयनित धार्मिक क्षेत्र का सामान्य परिचयः-

·       दुधाधारी मठ

·       महामाया मंदिर

·       बुढेश्वर मंदिर

·       कंकाली तालाब

·       हटकेश्वर मंदिर

·       शदाणी दरबार

·       कौशल्या माता मंदिर

·       चम्पारण

 

चयनित क्षेत्र:-

·       दुधाधारी मंदिर:- दुधाधारी मंदिर 17वीं शताब्दी का रायपुर नगर का सबसे प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर में मराठा कालिन पेटिंग आज भी विद्यमान है तथा वैष्णव संप्रदाय से संबंधित होने के कारण इस मंदिर में रामायण कालिन दृश्यों का शिल्पांकन किया गया है, जो अत्यंत आकर्षक है छत्तीसगढ़ में इस प्रकार के रामायण कालिन दृश्यों के शिल्पांकन का यह अनूठा मंदिर है जो बूढ़ा तालाब से थोड़ी दूरी पर दुधाधारी मंदिर स्थित है, यह रायपुर का प्राचीन और प्रतिष्ठित मंदिर है। कहा जाता है, कि राजस्थान के झींथरा नामक स्थल के गरीब दास नाम एक संत ने यहां डेरा जमाया था उनकी परंपरा में बलभद्र दास नामक संत हुए, जो अनाज ग्रहण नहीं करते थे, सिर्फ दुध आहार लेते थे, जिनके नाम पर मंदिर का नाम दुधाधारी हो गया। दुधाधारी महाराज के संबंध में अनेक किंदवंतिया प्रचलित है।

 

मंदिर का निर्माण कल्चुरी राजा जैत सिंह (राजस्व काल लगभग 1603 से 1614 ई.) के समय हुआ था। बिम्बाजी (राजस्व काल 1758 से 1787) के काल मंदिर को गढ़ी दृश्य विस्तार दिया गया। यहां प्रमुख मंदिर रामचंद्र जी का है, जो प्राचीन और उत्तर कालीन का सुन्दर प्रयोग किया गया है। बाहरी दीवारों में अत्यंत कलात्मक प्रतीमाओं का अंकन है। मुख्य मंदिर के अलावा मारूती का मंदिर उल्लेखित है। दुधाधारी मंदिर 17 वीं शताब्दी का प्राचीन मंदिर होने के कारण दर्शनीय है।

 

·       महामाया मंदिर:- महामाया मंदिर रायपुर का एक प्रमुख शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध है । यह मंदिर कल्चुरियों के द्वारा स्थापित की गई थी। किंदवतीयों के अनुसार राजा मोरध्वज ने महिषासुर मर्दिनी की अष्टभूजी प्रतिमा को यहां स्थापित किया था ऐसा प्रतीत होता है कि रतनपुर के कल्चुरियों कि एक शाखा जब रायपुर में स्थापित हो गई, तो उन्होने अपनी कुलदेवी महामाया की स्थापना रायपुर में की। महामाया मंदिर में मुख्य मंदिर की श्रृंखला में समलेश्वरी देवी, काल भैरव, बटुक भैरव और हनुमान जी के मंदिर हैं। मंदिर में कुछ प्राचीन प्रतिमाएं दर्शनीय है।

 

·       बुढेश्वर मंदिर:- शहर स्थित बुढेश्वर महादेव मंदिर प्रागण में स्थित कुंआ सैकड़ो साल पुराना है जिसके बारे कहा जाता है कि यह कुआं कभी नहीं सुखा। बारह महीने लबालब पानी भरा रहता है। आदिवासी समाज के इष्ट देव बुढ़ादेव के नाम पर स्थित बुढ़ातालाब के कारण शिवलिंग का नाम बुढेश्वर महादेव पड़ा। मान्यता है कि स्वयं भू शिवलिंग पर सांप लिपटे रहते थे, जिसे देखकर श्रद्धालुओं ने मंदिर का निर्माण करवाया। बुढ़ेश्वर महादेव की आरती के लिए रामेश्वर से भस्म मगवायीं जाती है। यहां प्रत्येक सोमवार को भस्म आरती होती है। भस्म आरती के लिए उपयोग में लायी जाने वाली भस्म रायपुर से 2000 किलोमीटर यानी रामेश्वर से मंगाई जाती है। इस मंदिर में पूजा अर्चना 400 साल पहले यहां के आदिवासी किया करते थे। आदिवासी समाज भोलेनाथ को बूढ़ादेव के स्वरूप में ही पूजता आ रहा है।

 

कहा जाता है कि मंदिर की जिम्मेदारी 1923 से रायपुर पुष्टिकर समाज कर रहा हैं। विक्रम संवत 2009 अर्थात आज से 63 साल पहले ही इस प्राचीन मंदिर का जिर्णोद्धार करके इसे नया रूप दिया गया है। मंदिर परिसर में अन्य मंदिर जैसे हनुमान जी, गायत्री माता, नरसिंह भगवान, राधा कृष्ण, संतोषी माता और काल भैरव के मंदिर भी है। यहां प्रतिदिन सुबह साढे 5 बजे और शाम साढे 7 बजे आरती की जाती है। इस मंदिर में भोलेनाथ को प्रतिदिन दोपहर 12 बजे भोग लगता है

 

मंदिर में ऐसी व्यवस्था की गई है कि निरंतर अभिषेक से श्रृंगार खराब ना हो सके। यहां भोलेनाथ को बेल पत्र, धतुरा, बेल फल, कनेर, आखड़े के पुष्पों की माला, धूप, दीप, अरबत्ती, नारियल आदि अर्पित किये जाते है।

 

·       कंकाली तालाब मंदिर:- कंकाली तालाब नगर की पुरानी बस्ती और ब्राम्हण पारा से लगे हुए कंकाली पारा में स्थित है। किंदवतियों के अनुसार दसनामी सन्यासी संप्रदाय के गोस्वामी नागा साधुओं ने यहां डेरा जमाया था। उन्हे स्वप्न में देवी के दर्शन हुए और उन्होने यहां कुण्ड सहित मंदिर का निर्माण करवाया। परंपरानुसार कुण्ड के मध्य में शिवजी का छोटा सा मंदिर भी बनवाया गया। तालाब तमें तीन और पत्थरों के सुंदर घाट बने हुए हैं। कंकाली देवी का मंदिर विशाल वट वृक्ष की छाया में स्थित है। मंदिर के आसपास गोस्वामियों की समाधियां भी बनी हुई है।

 

·       हटकेश्वर महादेव मंदिर:- रायपुर नगर की प्रारंभिक बसाहट खारून नदी के तट पर स्थित महादेव घाट क्षेत्र में हुई थी। रायपुर के कलचुरि राजाओं ने सर्वप्रथम इस क्षेत्र में अपनी राजधानी बनाई थी। राजा ब्रम्हदेव के विक्रम संवत् 1458 अर्थात 1402 ई. के शिालालेखों से ज्ञात होता है कि हाजीराज ने यहां हटकेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण कराया था। वर्तमान में खारून नदी के तट के आस-पास अनेक छोटे-बड़े मंदिर बन गए है, किन्तु सर्वाधिक महत्वपूर्ण हटकेश्वर महोदव का मंदिर है। यह मंदिर बाहर से आधुनिक प्रतित होता है, किन्तु सम्पूर्ण संरचना को देखने से इसके उत्तर-मध्यकालीन होने का अनुमान किया जा सकता है। यहां कार्तिक-पूर्णिमा के समय एक बड़ा मेला लगता है। महादेव घाट में ही विवेकानंद आश्रम के संस्थापक स्वामी आत्मानंद (1929 -1981) की समाधि भी स्थित है।

 

·       शदाणी दरबार:- संत शदाराम जी महाराज की पुण्य स्मृति में निर्मित रायपुर स्थित माना में पूज्य शदाणी दरबार तीर्थ आज ने केवल छत्तीसगढ़ का बल्कि पूरे भारत में सिंधु समाज का एक प्रमुख धार्मिक आस्था का केन्द्र माना जाता है। 17वीं शताब्दी के महान संत शदाराम जी का शदाणी दरबार सिंधु समाज का प्रमुख धार्मिक पर्यटन एवं तीर्थ स्थल के रूप में विख्यात है।

 

शदाणी दरबार रायपुर से 8 कि.मी. दूर रायपुर-जगदलपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर माना के पास स्थित है। लगभग 12 एकड़ में विस्तुत चहारदीवरी से घिरा हुआ मध्य में स्थित शदाणी दरबार मंदिर भव्य एवं कलात्मक है। इस मंदिर का निर्माण सिंधु सम्प्रदाय के अष्टम संत गोविंदराज जी महाराज ने 1990 में अपनी देख-रेख में रवाया था। षदाणी दरबार तक राजधानी रायपुर से निजी वाहन, सिटी बस, टैक्सी आदि से आसानी से पहुंचा जा सकता है। इस मार्ग में 24 घंटे आवागमन की सुविधा है।

 

संत शदाराम जी महाराज का जन्म पंजाब के लाहौर शहर में एक लोहाणा खत्री के घर में 1708 ईस्वी में हुआ था। ये बाल्यावस्था में ही ईश्वर भक्ति में लीन रहते थे। अपनी अलौकिक शक्ति से लोक कल्याण, परोपकार के कार्य एवं रामनाम का प्रचार करते थे।

 

·       कौशल्या माता चंद्रखुरी:- छत्तीसगढ़ की पावन भूमि में मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम की जननी माता कौशल्या का मंदिर, पूरे भारत में एक माल मंदिर होना इसकी दुर्लभता ही नहीं अपितु छत्तीसगढ़ राल्य की गौरवपूर्ण अस्मिता हैं। कौशल्या मंदिर रायपुर जिले के आरंग विकासखण्ड के अंतर्गत चन्द्रखुरी नामक एक छोटे से ग्राम में स्थित है। छत्तीसगढ़ की राजध्णानी रायपुर से 27 कि.मी. पूर्व दिशा में एक सुन्दर विशाल जलसेन जलाशय के मध्य में स्थित है।

 

छत्तीसगढ़ का प्रचाीन नाम कोसल था। रामायण काल में छत्तीसगढ़ का अधिकांश भाग दण्डकारण्य क्षेत्र के अंतर्गत आता था। यह क्षेत्र उन दिनों दक्षिणापथ भी कहलाता था। यह रामवनगमन पथ के अंतर्गत होने के कारण श्री रामचन्द्र जी के यहॉ वनवास काल में आने की जनश्रुति मिलती है जिसमें उनकी माता की जन्मस्थली होने के कारण उनका इस क्षेत्र में आगमन ननिहाल होने की पुष्टि करती है। चन्द्रखुरी स्थित माता कौशल्या मंदिर का जिर्णोद्वार 1973 में किया गया था। पुरातात्विक दृष्टि से इस मंदिर के अवशेष के अवलोकन से सोमवंशी कालीन आठवीं-नौवीं शती ईस्वी की मानी जाती है। इस जलसेन तालाब के आगे कुछ दूरी पर प्राचीन शिव मंदिर चंद्रखुरी जो इसके समकालीन स्थित है। पाषाण से निर्मित इस शिव मंदिर के भग्नावशेष की कलाकृति है। इस तालाब में सेतु बनाया गया है।

 

सेतु से जाकर इस मंदिर के प्रांगण में संरक्षित कलाकृतियों से माता कौशल्या का यह मंदिर जलसेन तालाब के मध्य में स्थित है जहां तक पहुंच जा सकता है। जलसेन तालाब लगभग 16 एकड़ क्षेत्र में विस्तृत है इस सुन्दर तालाब के चारों ओर लबालब जलराशि में तैरते हुये कमल पुष्प की सुन्दरता इस जलाशय की सुन्दरता को बढ़ाती है। जिससे इस मंदिर की नैसर्गिक सुन्दरता एवं रमणीयता और बढ़ जाती है। प्राकृतिक सुषमा के अनुक अनुपम दृश्य इस स्थल पर दृष्टिगोचर होते हैं। इस मंदिर के गर्भगृह में मॉ कौशल्या के गोद में बालरूप् में भगवान श्रीरामजी की वात्सल्यम प्रतिमा श्रद्धालुओं एवं भक्तों का मन मोह लेती है।

 

·       चम्पारण:- यह ऐतिहासिक महत्व का स्थान है। यहां पर वैष्णव सम्प्रदाय के प्रर्वतक वल्लभाचार्य जी का जन्म हुआ था। उनका जन्म वैशाख वदी 1334 को हुआ। आपके पिता श्री लक्षमण भट्ट और माता इल्लमगारू थे। इस परिवार का मूलतः स्थान आंध्रप्रदेश के खम्मन केनिकट कांकडवाड़ नामक गॉव थे। ये तैंलग ब्राम्हण थे और कृष्ण यजुर्वेद की तैतरीय शाखा के अतंर्गत इसका भारद्वाज गौत्र था। श्री वल्लभाचार्य का जन्म चम्पारण जिला रायपुर में हुआ। प्रत्येक वर्ष वैशाख कृष्ण एकादशी को जन्मोत्सव चम्पारण में मनाया जाता है। उस समय उनके माता पिता दक्षिण से काशी तीर्थ यात्रा करने जा रहे थे मार्ग में ही महाप्रभु का जन्म हुआ। यहां पर महाप्रभु की छठी बैठक भी हैं। 20वीं सदी में के अनुयायिंयों ने वल्लभाचार्य जी का एक प्रसिद्ध मंदिर बनवाया था।

 

बैठक के समीप यहां पर चम्पकेश्वर महादेव का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है। यही समीप में माता यमुना का मंदिर है। इसमें एक छोटी नदी बहती है। यहां के वन में जुता चप्पल पहन के नहीं जाया जाता है। मंदिर की बनावट इसकी साज-सज्जा नक्कासी देखने लायक है। यह मंदिर छत्तीसगढ़ में प्रसिद्ध मदिरों में से एक है। यहां पर पेड़ पौधों को नही काटा जाता है। आप इसका उदाहरण मंदिर के अंदर देख सकते हैं।जहां बिना पेड़ को छति पहुचाएं मंदिर का निर्माण किया गया है। यहां पर भी श्री वल्लभ गौसाला है। जिसमें भारी संख्या में गौमाता की सेवा किया जाता है और बिमार गौमाता का उपचार किया जाता है। यह मंदिर छत्तीसगढ़ को और अधिक कृर्ति प्रदान कर रहा है। जिसके कारण यहां पर देश विदेश से भी भारी मात्रा में पर्यटक आते है।यहां पर प्रति वर्ष माघ पूर्णिमा के दिन यहां महाप्रभु के सम्मान में विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। जिसमें लाखों की संख्या में भक्त जन सामिल होते है। श्री चम्पेश्वेर भोलेनाथ की यह पुरातन स्थली है। जहां वे जगतमाता पार्वती, श्रीगणेश जी के साथ विराजमान है इसका उल्लेख 108 ज्योर्तिलिंगों के वर्णन में भी है। इन्हीं की प्रेरणा से महाप्रभु श्री वल्लभाचाय्र जी के साथ पिता श्री काशी जाते हुए यहां पहुचे तथा पूजा अर्चना करने के तत्काल उपरांत उनका भावक उसके सम्मुख हुआ यह एक सुखद संयोग था कि वैष्णव मार्ग में पुष्टि मार्ग के प्रर्वतक का प्रागट्य आदि शक्ति शिव शंकर महोदव जी प्रथम वैष्णव माने जाते है। ?

 

टीपः- यह विश्वास किया जाता है कि यदि कोई गर्भवती महिला इसके आसपास के स्थान मे प्रवेश कर जाए तो गर्भपात हो जाता है। कहां जाता है कि आचार्य वल्लभाचार्य का जन्म गर्भपात होने के कारण उस समय हुआ जब उसके माता पिता तीर्थ यात्रा के लिए जाते समय गुजरे थे।

 

पास के अन्य आकर्षण केन्द्र:- चम्पारण से लगभग 6 कि.मी. पर टिला गांव जो महानदी तट पर बसा है। वहां महानदी पर बना एक एनिकेट है। जिसमें 116 गेट है और समीप में एक अतिसुदंर उद्यान है और एक विशाल हनुमान जी की प्रतिमा है जो ये यहां का प्रमुख आकर्षण का केन्द्र है।

 

चयनित धार्मिक स्थलों के लाभार्थीयों की कार्यिक दशा:

लाभार्थीयों की कार्यिक दशा:

1.  रोजगार की अवधि

2.  कार्य स्थल से घर की दूरी

3.  कार्य स्थल तक जाने की सुविधा

 

चयनित धार्मिक स्थलों के लाभार्थीयों की कार्यिक दशा:

लाभार्थीयों की कार्यिक दशा:-

1. रोजगार की अवधि:- काम करने की दशाओं में सबसे महत्वपूर्ण है। काम करने की समयावधि का कार्यरत महिलाओं पर गहरा प्रभाव पड़ता है। कार्य करने के घण्टों का कार्यरत महिलाओं के स्वास्थ्य उनकी कार्य कुशलता पारिवारिक जीवन धार्मिक कार्यों एवं सामाजिक का कार्यों आदि पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है, अधिक थकावट और तनाव से ग्रसित हो जाते है जिसके उनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है, प्रायः देखा गया है कि मजदूर वर्ग की महिलाएं तथा चिकित्सा क्षेत्र में कार्यरत महिलाएं अधिक समय तक कार्य करती है।

 

सारणी क्रमांक 1: रायपुर जिले के लाभार्थीयों कि रोजगार कि अवधि:-

जाति

4 घण्टे

4-6 घण्टे

6-8 घण्टे

8-10 घण्टे

10 से अधिक

अ.ज.जाति

2

3

58

31

2

अ. जाति

1

2

21

28

2

पिछड़ा वर्ग

11

13

57

24

16

सामान्य

1

2

23

10

1

कुल

15

20

159

93

24

प्रतिशत

4.82

6.43

51.12

29.9

7.71

स्रोत व्यक्तिगत सर्वेक्षण 2019

 

रायपुर जिले के लाभार्थीयों कि रोजगार कि अवधि

 

आरेख क्रमांक 1: रायपुर एवं गरियाबंद जिले में समयावधि के अनुसार 4 घंटे से कम समय में कार्य करने वाली कार्यरत महिलाओं का 4.82 प्रतिशत है, 4-6 घंटे के मध्य कार्यशील महिलाओं का 6.43 प्रतिशत है, 8-10 घंटे के मध्य कार्यशील महिलाओं का 51.12 प्रतिशत है, तथा 10 से अधिक घंटों तक कार्यशील महिलाओं का प्रतिशत 7.71 है इसके अतंर्गत प्रायः चिकित्सा क्षेत्र में कार्यरत महिलाएं तथा दुकान में कार्यरत सेल्स गर्ल सम्मिलित है।

 

2. कार्य स्थल से घर की दूरी:- कार्यशील महिलाओं के लिए घर से कार्यस्थल की दूरी उसकी कार्यक्षमता को प्रभावित करती है। एक कार्यरत महिला को घर परिवार की देख रेख भी करनी पड़ती है जिसके लिए समय की आवश्यकता होती है, इसलिए घर और उसके व्यवसायिक कार्यस्थल के बीच की दूरी कार्यरत महिला के लिए महत्वपूर्ण है। यदि कार्यरत महिला का कार्यस्थल नज़दीक है तो वह अपने कार्य एवं परिवार के जिम्मेदारियों का निर्वाह आसानी से कर पाते हैं, जबकि कार्यस्थल दूर होता तो आने जाने में समय नष्ट होता है जिससे उसके परिवार पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

 

3. कार्यस्थल तक जाने की सुविधा:- नगरीय क्षेत्र में यातायात के साधनों की प्रचुरता है, परंतु कार्यशील महिलाएं अपनी आर्थिक स्थिति एवं दूरी के अनुसार यातायात के साधनों का उपयोग करती है परंतु जिन कार्यरत महिलाओं का कार्य स्थल घर के निकट है वे पैदल ही कार्य स्थल तक पहुंचती है।

 

सारणी क्रमांक 1.2: लाभार्थीयों कि कार्यस्थल तक पहुच साधन:-

जाति

पैदल

सायकिल

रिक्शा

स्कूटर

बस/कार

अ.ज. जाति

51

20

16

10

2

अ. जाति

24

9

19

1

1

पिछड़ा

52

25

35

5

4

सामान्य

2

0

22

11

2

कुल

129

54

92

27

9

प्रतिशत

41.47

17.36

29.58

8.68

2.8

स्रोत व्यक्तिगत सर्वेक्षण 2019

 

लाभार्थीयों कि कार्यस्थल तक पहुच साधन:

 

आरेख क्रमांक 1.2:

 

निष्कर्ष (CONCLUSION):

अध्ययन से स्पष्ट होता है कि रायपुर जिले के धार्मिक स्थल स्थानीय लोगों के लिए रोजगार एवं आय का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। धार्मिक गतिविधियों से अनेक लाभार्थियों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष लाभ प्राप्त होता है। इसके अलावा अधिकांश लाभार्थियों की आर्थिक स्थिति अस्थिर पाई गई। सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधा एवं स्थायी रोजगार का अभाव उनकी प्रमुख समस्याएँ हैं। अतः सरकार एवं स्थानीय प्रशासन को धार्मिक स्थलों से जुडे लाभार्थियों के कल्याण हेतु योजनाएँ संचालित करनी चाहिए।

 

इस प्रकार रायपुर जिले की धार्मिक स्थलों से लाभार्थी परिवारों का जीवन स्तर में सुधार आया है तथा उन्होंने यह व्यापार व्यवसाय करके अपना परिवार को लाभान्वित कर रहे है। वह अपने विकास के साथ साथ अपने बच्चों के तथा अपने परिवारों के विकास के लिए विशेष ध्यान दे रहे है। लाभार्थी व्यक्तियों की व्यवसायीक संरचना जो क्रमशः दुकान पूजा समान, फल सब्जी, मनिहारी, चाय किराना, होटल, पार्किंग, पुजारी, फोटो, मजदूरी, फूल नारियल, रेस्टोरेंट, तथा अन्य कार्य करके वह अपने आर्थिक समस्याएं को सुधार रहे है। उन्होने यह सभी कार्यिक प्रतिरूप के द्वारा अपनी परिवारिक आर्थिक स्थिति में बहुत सुधार लाये है।

 

सुझाव:

·       लाभार्थियों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ लागू की जाएँ।

·       छोटे व्यापारियों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाए।

·       धार्मिक पर्यटन को बढावा दिया जाए।

·       धार्मिक स्थलों के आसपास स्वच्छता एवं आधारभूत सुविधाओं का विकास किया जाए।

·       लाभार्थियों के कौशल विकास हेतु प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाएँ।

 

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Received on 09.07.2026      Revised on 27.07.2026

Accepted on 11.08.2026      Published on 17.08.2026

Available online from August 22, 2026

Int. J. of Reviews and Res. in Social Sci. 2026; 14(3):149-158.

DOI: 10.52711/2454-2687.2026.00026

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